॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.20.21
पीत्वापः पादपाः पद्भिरासन्नानात्ममूर्तयः।
प्राक् क्षामास्तपसा श्रान्ता यथा कामानुसेवया॥ २१
pītvāpaḥ pādapāḥ padbhirāsannānātmamūrtayaḥ|
prāk kṣāmāstapasā śrāntā yathā kāmānusevayā|| 21
अर्थ
जो वृक्ष जेठ-आषाढ़में सूख गये थे, वे अब अपनी जड़ोंसे जल पीकर पत्ते, फूल तथा डालियोंसे खूब सज-धज गये—जैसे सकामभावसे तपस्या करनेवाले पहले तो दुर्बल हो जाते हैं, परन्तु कामना पूरी होनेपर मोटे-तगड़े हो जाते हैं॥ २१॥✎ 1664