श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

भगवानाहता वीक्ष्य शुद्धभावप्रसादितः।

स्कन्धे निधाय वासांसि प्रीतः प्रोवाच सस्मितम्॥ १८

bhagavānāhatā vīkṣya śuddhabhāvaprasāditaḥ|

skandhe nidhāya vāsāṃsi prītaḥ provāca sasmitam|| 18

अर्थ

उनके इस शुद्ध भावसे भगवान् बहुत ही प्रसन्‍न हुए। उनको अपने पास आयी देखकर उन्होंने गोपियोंके वस्त्र अपने कंधेपर रख लिये और बड़ी प्रसन्‍नतासे मुसकराते हुए बोले—॥ १८॥

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