परीक्षित्! गोपियोंने अपने-अपने वस्त्र पहन लिये। परन्तु श्रीकृष्णने उनके चित्तको इस प्रकार अपने वशमें कर रखा था कि वे वहाँसे एक पग भी न चल सकीं। अपने प्रियतमके समागमके लिये सजकर वे उन्हींकी ओर लजीली चितवनसे निहारती रहीं॥ २३॥
परिधाय स्ववासांसि प्रेष्ठसंगमसज्जिताः।
गृहीतचित्ता नो चेलुस्तस्मिँल्लज्जायितेक्षणाः॥ २३
परीक्षित्! गोपियोंने अपने-अपने वस्त्र पहन लिये। परन्तु श्रीकृष्णने उनके चित्तको इस प्रकार अपने वशमें कर रखा था कि वे वहाँसे एक पग भी न चल सकीं। अपने प्रियतमके समागमके लिये सजकर वे उन्हींकी ओर लजीली चितवनसे निहारती रहीं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.22.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 273) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/22/23/