श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.22.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

संकल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम्।

मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति॥ २५

saṃkalpo viditaḥ sādhvyo bhavatīnāṃ madarcanam|

mayānumoditaḥ so'sau satyo bhavitumarhati|| 25

अर्थ

‘मेरी परम प्रेयसी कुमारियो! मैं तुम्हारा यह संकल्प जानता हूँ कि तुम मेरी पूजा करना चाहती हो। मैं तुम्हारी इस अभिलाषाका अनुमोदन करता हूँ, तुम्हारा यह संकल्प सत्य होगा। तुम मेरी पूजा कर सकोगी॥ २५॥

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