परीक्षित्! वे ब्राह्मणियाँ बहुत दिनोंसे भगवान्की मनोहर लीलाएँ सुनती थीं। उनका मन उनमें लग चुका था। वे सदा-सर्वदा इस बातके लिये उत्सुक रहतीं कि किसी प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन हो जायँ। श्रीकृष्णके आनेकी बात सुनते ही वे उतावली हो गयीं॥ १८॥
श्रुत्वाच्युतमुपायातं नित्यं तद्दर्शनोत्सुकाः।
तत्कथाक्षिप्तमनसो बभूवुर्जातसम्भ्रमाः॥ १८
परीक्षित्! वे ब्राह्मणियाँ बहुत दिनोंसे भगवान्की मनोहर लीलाएँ सुनती थीं। उनका मन उनमें लग चुका था। वे सदा-सर्वदा इस बातके लिये उत्सुक रहतीं कि किसी प्रकार श्रीकृष्णके दर्शन हो जायँ। श्रीकृष्णके आनेकी बात सुनते ही वे उतावली हो गयीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 283) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/18/