श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

तास्तथा त्यक्तसर्वाशाः प्राप्ता आत्मदिदृक्षया।

विज्ञायाखिलदृग्द्रष्टा प्राह प्रहसिताननः॥ २४

tāstathā tyaktasarvāśāḥ prāptā ātmadidṛkṣayā|

vijñāyākhiladṛgdraṣṭā prāha prahasitānanaḥ|| 24

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! भगवान् सबके हृदयकी बात जानते हैं, सबकी बुद्धियोंके साक्षी हैं। उन्होंने जब देखा कि ये ब्राह्मणपत्‍नियाँ अपने भाई-बन्धु और पति-पुत्रोंके रोकनेपर भी सब सगे-सम्बन्धियों और विषयोंकी आशा छोड़कर केवल मेरे दर्शनकी लालसासे ही मेरे पास आयी हैं, तब उन्होंने उनसे कहा। उस समय उनके मुखारविन्दपर हास्यकी तरंगें अठखेलियाँ कर रही थीं॥ २४॥

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