श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नन्वद्धा मयि कुर्वन्ति कुशलाः स्वार्थदर्शनाः।

अहैतुक्यव्यवहितां भक्तिमात्मप्रिये यथा॥ २६

nanvaddhā mayi kurvanti kuśalāḥ svārthadarśanāḥ|

ahaitukyavyavahitāṃ bhaktimātmapriye yathā|| 26

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं कि संसारमें अपनी सच्ची भलाईको समझनेवाले जितने भी बुद्धिमान् पुरुष हैं, वे अपने प्रियतमके समान ही मुझसे प्रेम करते हैं और ऐसा प्रेम करते हैं जिसमें किसी प्रकारकी कामना नहीं रहती—जिसमें किसी प्रकारका व्यवधान, संकोच, छिपाव, दुविधा या द्वैत नहीं होता॥ २६॥

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