श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

दृष्ट्वा स्त्रीणां भगवति कृष्णे भक्तिमलौकिकीम्।

आत्मानं च तया हीनमनुतप्ता व्यगर्हयन्॥ ३८

dṛṣṭvā strīṇāṃ bhagavati kṛṣṇe bhaktimalaukikīm|

ātmānaṃ ca tayā hīnamanutaptā vyagarhayan|| 38

अर्थ

जब उन्होंने देखा कि हमारी पत्‍नियोंके हृदयमें तो भगवान्‌का अलौकिक प्रेम है और हमलोग उससे बिलकुल रीते हैं, तब वे पछता-पछताकर अपनी निन्दा करने लगे॥ ३८॥

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