॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.40
नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी।
यद् वयं गुरवो नॄणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजाः॥ ४०
nūnaṃ bhagavato māyā yogināmapi mohinī|
yad vayaṃ guravo nṝṇāṃ svārthe muhyāmahe dvijāḥ|| 40
अर्थ
निश्चय ही, भगवान्की माया बड़े-बड़े योगियोंको भी मोहित कर लेती है। तभी तो हम कहलाते हैं मनुष्योंके गुरु और ब्राह्मण, परन्तु अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थके विषयमें बिलकुल भूले हुए हैं॥ ४०॥