श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नूनं भगवतो माया योगिनामपि मोहिनी।

यद् वयं गुरवो नॄणां स्वार्थे मुह्यामहे द्विजाः॥ ४०

nūnaṃ bhagavato māyā yogināmapi mohinī|

yad vayaṃ guravo nṝṇāṃ svārthe muhyāmahe dvijāḥ|| 40

अर्थ

निश्‍चय ही, भगवान्‌की माया बड़े-बड़े योगियोंको भी मोहित कर लेती है। तभी तो हम कहलाते हैं मनुष्योंके गुरु और ब्राह्मण, परन्तु अपने सच्चे स्वार्थ और परमार्थके विषयमें बिलकुल भूले हुए हैं॥ ४०॥

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