॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.45
अन्यथा पूर्णकामस्य कैवल्याद्याशिषां पतेः।
ईशितव्यैः किमस्माभिरीशस्यैतद् विडम्बनम्॥ ४५
anyathā pūrṇakāmasya kaivalyādyāśiṣāṃ pateḥ|
īśitavyaiḥ kimasmābhirīśasyaitad viḍambanam|| 45
अर्थ
भगवान् स्वयं पूर्णकाम हैं और कैवल्यमोक्षपर्यन्त जितनी भी कामनाएँ होती हैं, उनको पूर्ण करनेवाले हैं। यदि हमें सचेत नहीं करना होता तो उनका हम-सरीखे क्षुद्र जीवोंसे प्रयोजन ही क्या हो सकता था? अवश्य ही उन्होंने इसी उद्देश्यसे माँगनेका बहाना बनाया। अन्यथा उन्हें माँगनेकी भला क्या आवश्यकता थी?॥ ४५॥