वे आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हमारे इस अपराधको क्षमा करें। क्योंकि हमारी बुद्धि उनकी मायासे मोहित हो रही है और हम उनके प्रभावको न जाननेवाले अज्ञानी हैं॥ ५१॥
स वै न आद्यः पुरुषः स्वमायामोहितात्मनाम्।
अविज्ञातानुभावानां क्षन्तुमर्हत्यतिक्रमम्॥ ५१
वे आदि पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हमारे इस अपराधको क्षमा करें। क्योंकि हमारी बुद्धि उनकी मायासे मोहित हो रही है और हम उनके प्रभावको न जाननेवाले अज्ञानी हैं॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.23.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 288) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/23/51/