॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.24.16
स्वभावतन्त्रो हि जनः स्वभावमनुवर्तते।
स्वभावस्थमिदं सर्वं सदेवासुरमानुषम्॥ १६
svabhāvatantro hi janaḥ svabhāvamanuvartate|
svabhāvasthamidaṃ sarvaṃ sadevāsuramānuṣam|| 16
अर्थ
मनुष्य अपने स्वभाव (पूर्व-संस्कारों) के अधीन है। वह उसीका अनुसरण करता है। यहाँतक कि देवता, असुर, मनुष्य आदिको लिये हुए यह सारा जगत् स्वभावमें ही स्थित है॥ १६॥