॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.24.20
वर्तेत ब्रह्मणा विप्रो राजन्यो रक्षया भुवः।
वैश्यस्तु वार्तया जीवेच्छूद्रस्तु द्विजसेवया॥ २०
varteta brahmaṇā vipro rājanyo rakṣayā bhuvaḥ|
vaiśyastu vārtayā jīvecchūdrastu dvijasevayā|| 20
अर्थ
ब्राह्मण वेदोंके अध्ययन-अध्यापनसे, क्षत्रिय पृथ्वीपालनसे, वैश्य वार्तावृत्तिसे और शूद्र ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवासे अपनी जीविकाका निर्वाह करें॥ २०॥