श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

अन्येभ्यश्‍चाश्‍वचाण्डालपतितेभ्यो यथार्हतः।

यवसं च गवां दत्त्वा गिरये दीयतां बलिः॥ २८

anyebhyaścāśvacāṇḍālapatitebhyo yathārhataḥ|

yavasaṃ ca gavāṃ dattvā giraye dīyatāṃ baliḥ|| 28

अर्थ

और भी, चाण्डाल, पतित तथा कुत्तोंतकको यथायोग्य वस्तुएँ देकर गायोंको चारा दिया जाय और फिर गिरिराजको भोग लगाया जाय॥ २८॥✎ 1667

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1667 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आप-लोगोंको → आपलोगोंको

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