श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

एतद् ब्रूहि महान् कामो मह्यं शुश्रूषवे पितः।

न हि गोप्यं हि साधूनां कृत्यं सर्वात्मनामिह॥ ४

etad brūhi mahān kāmo mahyaṃ śuśrūṣave pitaḥ|

na hi gopyaṃ hi sādhūnāṃ kṛtyaṃ sarvātmanāmiha|| 4

अर्थ

आप मेरे पिता हैं और मैं आपका पुत्र। ये बातें सुननेके लिये मुझे बड़ी उत्कण्ठा भी है। पिताजी! जो संत पुरुष सबको अपनी आत्मा मानते हैं, जिनकी दृष्टिमें अपने और परायेका भेद नहीं है, जिनका न कोई मित्र है, न शत्रु और न उदासीन—उनके पास छिपानेकी तो कोई बात होती ही नहीं। परन्तु यदि ऐसी स्थिति न हो तो रहस्यकी बात शत्रुकी भाँति उदासीनसे भी नहीं कहनी चाहिये। मित्र तो अपने समान ही कहा गया है, इसलिये उससे कोई बात छिपायी नहीं जाती॥ ४-५॥

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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