॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.27.4
इन्द्र उवाच
विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं
तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम्।
मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो
न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः॥ ४
viśuddhasattvaṃ tava dhāma śāntaṃ
tapomayaṃ dhvastarajastamaskam|
māyāmayo'yaṃ guṇasampravāho
na vidyate te'grahaṇānubandhaḥ|| 4
अर्थ
इन्द्रने कहा—भगवन्! आपका स्वरूप परम शान्त, ज्ञानमय, रजोगुण तथा तमोगुणसे रहित एवं विशुद्ध अप्राकृत सत्त्वमय है। यह गुणोंके प्रवाहरूपसे प्रतीत होनेवाला प्रपंच केवल मायामय है; क्योंकि आपका स्वरूप न जाननेके कारण ही आपमें इसकी प्रतीति होती है॥ ४॥