श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

जनो वै लोक एतस्मिन्‍नविद्याकामकर्मभिः।

उच्चावचासु गतिषु न वेद स्वां गतिं भ्रमन्॥ १३

jano vai loka etasminnavidyākāmakarmabhiḥ|

uccāvacāsu gatiṣu na veda svāṃ gatiṃ bhraman|| 13

अर्थ

‘इस संसारमें जीव अज्ञानवश शरीरमें आत्मबुद्धि करके भाँति-भाँतिकी कामना और उनकी पूर्तिके लिये नाना प्रकारके कर्म करता है। फिर उनके फलस्वरूप देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि ऊँची-नीची योनियोंमें भटकता फिरता है, अपनी असली गतिको—आत्मस्वरूपको नहीं पहचान पाता॥ १३॥

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