श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

राजोवाच

कृष्णं विदुः परं कान्तं न तु ब्रह्मतया मुने।

गुणप्रवाहोपरमस्तासां गुणधियां कथम्॥ १२

kṛṣṇaṃ viduḥ paraṃ kāntaṃ na tu brahmatayā mune|

guṇapravāhoparamastāsāṃ guṇadhiyāṃ katham|| 12

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! गोपियाँ तो भगवान् श्रीकृष्णको केवल अपना परम प्रियतम ही मानती थीं। उनका उनमें ब्रह्मभाव नहीं था। इस प्रकार उनकी दृष्टि प्राकृत गुणोंमें ही आसक्त दीखती है। ऐसी स्थितिमें उनके लिये गुणोंके प्रवाहरूप इस संसारकी निवृत्ति कैसे सम्भव हुई?॥ १२॥

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