श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

दृष्टं वनं कुसुमितं राकेशकररंजितम्।

यमुनानिललीलैजत्तरुपल्लवशोभितम् ॥ २१

dṛṣṭaṃ vanaṃ kusumitaṃ rākeśakararaṃjitam|

yamunānilalīlaijattarupallavaśobhitam || 21

अर्थ

तुमलोगोंने रंग-बिरंगे पुष्पोंसे लदे हुए इस वनकी शोभाको देखा। पूर्ण चन्द्रमाकी कोमल रश्मियोंसे यह रँगा हुआ है, मानो उन्होंने अपने हाथों चित्रकारी की हो; और यमुनाजीके जलका स्पर्श करके बहनेवाले शीतल समीरकी मन्द-मन्द गतिसे हिलते हुए ये वृक्षोंके पत्ते तो इस वनकी शोभाको और भी बढ़ा रहे हैं। परन्तु अब तो तुमलोगोंने यह सब कुछ देख लिया॥ २१॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें