श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

दुःशीलो दुर्भगो वृद्धो जडो रोग्यधनोऽपि वा।

पतिः स्त्रीभिर्न हातव्यो लोकेप्सुभिरपातकी॥ २५

duḥśīlo durbhago vṛddho jaḍo rogyadhano'pi vā|

patiḥ strībhirna hātavyo lokepsubhirapātakī|| 25

अर्थ

जिन स्त्रियोंको उत्तम लोक प्राप्त करनेकी अभिलाषा हो, वे पातकीको छोड़कर और किसी भी प्रकारके पतिका परित्याग न करें। भले ही वह बुरे स्वभाव-वाला, भाग्यहीन, वृद्ध, मूर्ख, रोगी या निर्धन ही क्यों न हो॥ २५॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

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