श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इति विप्रियमाकर्ण्य गोप्यो गोविन्दभाषितम्।

विषण्णा भ‌ग्‍नसंकल्पाश्‍चिन्तामापुर्दुरत्ययाम्॥ २८

iti vipriyamākarṇya gopyo govindabhāṣitam|

viṣaṇṇā bhagnasaṃkalpāścintāmāpurduratyayām|| 28

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णका यह अप्रिय भाषण सुनकर गोपियाँ उदास, खिन्‍न हो गयीं। उनकी आशा टूट गयी। वे चिन्ताके अथाह एवं अपार समुद्रमें डूबने-उतराने लगीं॥ २८॥

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