श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

चित्तं सुखेन भवतापहृतं गृहेषु

यन्‍निर्विशत्युत करावपि गृह्यकृत्ये।

पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद्

यामः कथं व्रजमथो करवाम किं वा॥ ३४

cittaṃ sukhena bhavatāpahṛtaṃ gṛheṣu

yannirviśatyuta karāvapi gṛhyakṛtye|

pādau padaṃ na calatastava pādamūlād

yāmaḥ kathaṃ vrajamatho karavāma kiṃ vā|| 34

अर्थ

मनमोहन! अबतक हमारा चित्त घरके काम-धंधोंमें लगता था। इसीसे हमारे हाथ भी उनमें रमे हुए थे। परन्तु तुमने हमारे देखते-देखते हमारा वह चित्त लूट लिया। इसमें तुम्हें कोई कठिनाई भी नहीं उठानी पड़ी, तुम तो सुखस्वरूप हो न! परन्तु अब तो हमारी गति-मति निराली ही हो गयी है। हमारे ये पैर तुम्हारे चरणकमलोंको छोड़कर एक पग भी हटनेके लिये तैयार नहीं हैं, नहीं हट रहे हैं। फिर हम व्रजमें कैसे जायँ? और यदि वहाँ जायँ भी तो करें क्या?॥ ३४॥

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