श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

स एव स्वप्रकृत्येदं सृष्ट्वाग्रे त्रिगुणात्मकम्।

तदनु त्वं ह्यप्रविष्टः प्रविष्ट इव भाव्यसे॥ १४

sa eva svaprakṛtyedaṃ sṛṣṭvāgre triguṇātmakam|

tadanu tvaṃ hyapraviṣṭaḥ praviṣṭa iva bhāvyase|| 14

अर्थ

आप ही सर्गके आदिमें अपनी प्रकृतिसे इस त्रिगुणमय जगत‍्की सृष्टि करते हैं। फिर उसमें प्रविष्ट न होनेपर भी आप प्रविष्टके समान जान पड़ते हैं॥ १४॥

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