श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

सन्‍निपत्य समुत्पाद्य दृश्यन्तेऽनुगता इव।

प्रागेव विद्यमानत्वान्‍न तेषामिह सम्भवः॥ १६

sannipatya samutpādya dṛśyante'nugatā iva|

prāgeva vidyamānatvānna teṣāmiha sambhavaḥ|| 16

अर्थ

जैसे जबतक महत्तत्त्व आदि कारण-तत्त्व पृथक्-पृथक् रहते हैं, तबतक उनकी शक्ति भी पृथक्-पृथक् होती है; जब वे इन्द्रियादि सोलह विकारोंके साथ मिलते हैं, तभी इस ब्रह्माण्डकी रचना करते हैं और इसे उत्पन्‍न करके इसीमें अनुप्रविष्ट-से जान पड़ते हैं; परंतु सच्ची बात तो यह है कि वे किसी भी पदार्थमें प्रवेश नहीं करते। ऐसा होनेका कारण यह है कि उनसे बनी हुई जो भी वस्तु है, उसमें वे पहलेसे ही विद्यमान रहते हैं॥ १५-१६॥

यह अर्थ श्लोक 15–16 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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