श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

त्वत्तोऽस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभो

वदन्त्यनीहादगुणादविक्रियात् ।

त्वयीश्‍वरे ब्रह्मणि नो विरुध्यते

त्वदाश्रयत्वादुपचर्यते गुणैः॥ १९

tvatto'sya janmasthitisaṃyamān vibho

vadantyanīhādaguṇādavikriyāt |

tvayīśvare brahmaṇi no virudhyate

tvadāśrayatvādupacaryate guṇaiḥ|| 19

अर्थ

प्रभो! कहते हैं कि आप स्वयं समस्त क्रियाओं, गुणों और विकारोंसे रहित हैं। फिर भी इस जगत‍्की सृष्टि, स्थिति और प्रलय आपसे ही होते हैं। यह बात परम ऐश्‍वर्यशाली परब्रह्म परमात्मा आपके लिये असंगत नहीं है । क्योंकि तीनों गुणोंके आश्रय आप ही हैं, इसलिये उन गुणोंके कार्य आदिका आपमें ही आरोप किया जाता है॥ १९॥

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