श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.3.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

मर्त्यो मृत्युव्यालभीतः पलायन्

लोकान् सर्वान्‍निर्भयं नाध्यगच्छत्।

त्वत्पादाब्जं प्राप्य यदृच्छयाद्य

स्वस्थः शेते मृत्युरस्मादपैति॥ २७

martyo mṛtyuvyālabhītaḥ palāyan

lokān sarvānnirbhayaṃ nādhyagacchat|

tvatpādābjaṃ prāpya yadṛcchayādya

svasthaḥ śete mṛtyurasmādapaiti|| 27

अर्थ

प्रभो! यह जीव मृत्युग्रस्त हो रहा है। यह मृत्युरूप कराल व्यालसे भयभीत होकर सम्पूर्ण लोक-लोकान्तरोंमें भटकता रहा है; परन्तु इसे कभी कहीं भी ऐसा स्थान न मिल सका, जहाँ यह निर्भय होकर रहे। आज बड़े भाग्यसे इसे आपके चरणारविन्दोंकी शरण मिल गयी। अतः अब यह स्वस्थ होकर सुखकी नींद सो रहा है। औरोंकी तो बात ही क्या, स्वयं मृत्यु भी इससे भयभीत होकर भाग गयी है॥ २७॥

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