॥ श्रीहरिः ॥
युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत्।
चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम्॥ ४५
yuvāṃ māṃ putrabhāvena brahmabhāvena cāsakṛt|
cintayantau kṛtasnehau yāsyethe madgatiṃ parām|| 45
अर्थ
तुम दोनों मेरे प्रति पुत्रभाव तथा निरन्तर ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य-स्नेह और चिन्तनके द्वारा तुम्हें मेरे परम पदकी प्राप्ति होगी॥ ४५॥
युवां मां पुत्रभावेन ब्रह्मभावेन चासकृत्।
चिन्तयन्तौ कृतस्नेहौ यास्येथे मद्गतिं पराम्॥ ४५
तुम दोनों मेरे प्रति पुत्रभाव तथा निरन्तर ब्रह्मभाव रखना। इस प्रकार वात्सल्य-स्नेह और चिन्तनके द्वारा तुम्हें मेरे परम पदकी प्राप्ति होगी॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.3.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 143) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/3/45/