जैसे श्रीकृष्ण वनमें करते थे, वैसे ही एक गोपी बाँसुरी बजा-बजाकर दूर गये हुए पशुओंको बुलानेका खेल खेलने लगी। तब दूसरी गोपियाँ ‘वाह-वाह’ करके उसकी प्रशंसा करने लगीं॥ १८॥✎ 1431
आहूय दूरगा यद्वत् कृष्णस्तमनुकुर्वतीम्।
वेणुं क्वणन्तीं क्रीडन्तीमन्याः शंसन्ति साध्विति॥ १८
जैसे श्रीकृष्ण वनमें करते थे, वैसे ही एक गोपी बाँसुरी बजा-बजाकर दूर गये हुए पशुओंको बुलानेका खेल खेलने लगी। तब दूसरी गोपियाँ ‘वाह-वाह’ करके उसकी प्रशंसा करने लगीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 319) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)