श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

आरुह्यैका पदाऽऽक्रम्य शिरस्याहापरां नृप।

दुष्टाहे गच्छ जातोऽहं खलानां ननु दण्डधृक्॥ २१

āruhyaikā padā''kramya śirasyāhāparāṃ nṛpa|

duṣṭāhe gaccha jāto'haṃ khalānāṃ nanu daṇḍadhṛk|| 21

अर्थ

परीक्षित्! एक गोपी बनी कालिय नाग, तो दूसरी श्रीकृष्ण बनकर उसके सिरपर पैर रखकर चढ़ी-चढ़ी बोलने लगी—‘रे दुष्ट साँप! तू यहाँसे चला जा। मैं दुष्टोंका दमन करनेके लिये ही उत्पन्‍न हुआ हूँ’॥ २१॥✎ 1431

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1431 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लगी। → लगीं।

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