॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.30.3
गतिस्मितप्रेक्षणभाषणादिषु
प्रियाः प्रियस्य प्रतिरूढमूर्तयः।
असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका
न्यवेदिषुः कृष्णविहारविभ्रमाः॥ ३
gatismitaprekṣaṇabhāṣaṇādiṣu
priyāḥ priyasya pratirūḍhamūrtayaḥ|
asāvahaṃ tvityabalāstadātmikā
nyavediṣuḥ kṛṣṇavihāravibhramāḥ|| 3
अर्थ
अपने प्रियतम श्रीकृष्णकी चाल-ढाल, हास-विलास और चितवन-बोलन आदिमें श्रीकृष्णकी प्यारी गोपियाँ उनके समान ही बन गयीं; उनके शरीरमें भी वही गति-मति, वही भाव-भंगी उतर आयी। वे अपनेको सर्वथा भूलकर श्रीकृष्ण-स्वरूप हो गयीं और उन्हींके लीला-विलासका अनुकरण करती हुई ‘मैं श्रीकृष्ण ही हूँ’—इस प्रकार कहने लगीं॥ ३॥