गोपियोंका रोम-रोम इस बातकी प्रतीक्षा और आकांक्षा कर रहा था कि जल्दी-से-जल्दी श्रीकृष्ण आयें। श्रीकृष्णकी ही भावनामें डूबी हुई गोपियाँ यमुनाजीके पावन पुलिनपर—रमणरेतीमें लौट आयीं और एक साथ मिलकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करने लगीं॥ ४५॥
पुनः पुलिनमागत्य कालिन्द्याः कृष्णभावनाः।
समवेता जगुः कृष्णं तदागमनकांक्षिताः॥ ४५
गोपियोंका रोम-रोम इस बातकी प्रतीक्षा और आकांक्षा कर रहा था कि जल्दी-से-जल्दी श्रीकृष्ण आयें। श्रीकृष्णकी ही भावनामें डूबी हुई गोपियाँ यमुनाजीके पावन पुलिनपर—रमणरेतीमें लौट आयीं और एक साथ मिलकर श्रीकृष्णके गुणोंका गान करने लगीं॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 323) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/45/