dṛṣṭo vaḥ kaccidaśvattha plakṣa nyagrodha no manaḥ|
nandasūnurgato hṛtvā premahāsāvalokanaiḥ|| 5
अर्थ
(गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा) ‘हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?॥ ५॥
दृष्टो वः कच्चिदश्वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः।
नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः॥ ५
(गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा) ‘हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 317) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/5/