श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.30.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 30 · अथ त्रिंशोऽध्यायः

दृष्टो वः कच्चिदश्‍वत्थ प्लक्ष न्यग्रोध नो मनः।

नन्दसूनुर्गतो हृत्वा प्रेमहासावलोकनैः॥ ५

dṛṣṭo vaḥ kaccidaśvattha plakṣa nyagrodha no manaḥ|

nandasūnurgato hṛtvā premahāsāvalokanaiḥ|| 5

अर्थ

(गोपियोंने पहले बड़े-बड़े वृक्षोंसे जाकर पूछा) ‘हे पीपल, पाकर और बरगद! नन्दनन्दन श्यामसुन्दर अपनी प्रेमभरी मुसकान और चितवनसे हमारा मन चुराकर चले गये हैं। क्या तुमलोगोंने उन्हें देखा है?॥ ५॥

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