श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

दिनपरिक्षये नीलकुन्तलै-

र्वनरुहाननं बिभ्रदावृतम्।

घनरजस्वलं दर्शयन् मुहु-

र्मनसि नः स्मरं वीर यच्छसि॥ १२

dinaparikṣaye nīlakuntalai-

rvanaruhānanaṃ bibhradāvṛtam|

ghanarajasvalaṃ darśayan muhu-

rmanasi naḥ smaraṃ vīra yacchasi|| 12

अर्थ

दिन ढलनेपर जब तुम वनसे घर लौटते हो, तो हम देखती हैं कि तुम्हारे मुखकमलपर नीली-नीली अलकें लटक रही हैं और गौओंके खुरसे उड़-उड़कर घनी धूल पड़ी हुई है। हमारे वीर प्रियतम! तुम अपना वह सौन्दर्य हमें दिखा-दिखाकर हमारे हृदयमें मिलनकी आकांक्षा—प्रेम उत्पन्‍न करते हो॥ १२॥

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