॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.31.14
सुरतवर्धनं शोकनाशनं
स्वरितवेणुना सुष्ठु चुम्बितम्।
इतररागविस्मारणं नृणां ✎ 1156
वितर वीर नस्तेऽधरामृतम्॥ १४
suratavardhanaṃ śokanāśanaṃ
svaritaveṇunā suṣṭhu cumbitam|
itararāgavismāraṇaṃ nṛṇāṃ
vitara vīra naste'dharāmṛtam|| 14
अर्थ
वीरशिरोमणे! तुम्हारा अधरामृत मिलनके सुखको—आकांक्षाको बढ़ानेवाला है। वह विरहजन्य समस्त शोक-सन्तापको नष्ट कर देता है। यह गानेवाली बाँसुरी भलीभाँति उसे चूमती रहती है। जिन्होंने एक बार उसे पी लिया, उन लोगोंको फिर दूसरों और दूसरोंकी आसक्तियोंका स्मरण भी नहीं होता। हमारे वीर! अपना वही अधरामृत हमें वितरण करो, पिलाओ॥ १४॥