श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.31.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 31 · अथैकत्रिंशोऽध्यायः

तव कथामृतं तप्तजीवनं

कविभिरीडितं कल्मषापहम्।

श्रवणमङ्गलं श्रीमदाततं

भुवि गृणन्ति ते भूरिदा जनाः॥ ९

tava kathāmṛtaṃ taptajīvanaṃ

kavibhirīḍitaṃ kalmaṣāpaham|

śravaṇamaṅgalaṃ śrīmadātataṃ

bhuvi gṛṇanti te bhūridā janāḥ|| 9

अर्थ

प्रभो! तुम्हारी लीलाकथा भी अमृतस्वरूप है। विरहसे सताये हुए लोगोंके लिये तो वह जीवन सर्वस्व ही है। बड़े-बड़े ज्ञानी महात्माओं—भक्त कवियोंने उसका गान किया है, वह सारे पाप-ताप तो मिटाती ही है, साथ ही श्रवणमात्रसे परम मंगल—परम कल्याणका दान भी करती है। वह परम सुन्दर, परम मधुर और बहुत विस्तृत भी है। जो तुम्हारी उस लीला-कथाका गान करते हैं, वास्तवमें भूलोकमें वे ही सबसे बड़े दाता हैं॥ ९॥

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