इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन व्रजसुन्दरियोंको साथ लेकर यमुनाजीके पुलिनमें प्रवेश किया। उस समय खिले हुए कुन्द और मन्दारके पुष्पोंकी सुरभि लेकर बड़ी ही शीतल और सुगन्धित मन्द-मन्द वायु चल रही थी और उसकी महँकसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर मँडरा रहे थे॥ ११॥✎ 1432
ताः समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभुः।
विकसत्कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम् ॥ ११
इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन व्रजसुन्दरियोंको साथ लेकर यमुनाजीके पुलिनमें प्रवेश किया। उस समय खिले हुए कुन्द और मन्दारके पुष्पोंकी सुरभि लेकर बड़ी ही शीतल और सुगन्धित मन्द-मन्द वायु चल रही थी और उसकी महँकसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर मँडरा रहे थे॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.32.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 328) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/32/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1432 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकसे → महँकसे