श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

ताः समादाय कालिन्द्या निर्विश्य पुलिनं विभुः।

विकसत्कुन्दमन्दारसुरभ्यनिलषट्पदम् ॥ ११

tāḥ samādāya kālindyā nirviśya pulinaṃ vibhuḥ|

vikasatkundamandārasurabhyanilaṣaṭpadam || 11

अर्थ

इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने उन व्रजसुन्दरियोंको साथ लेकर यमुनाजीके पुलिनमें प्रवेश किया। उस समय खिले हुए कुन्द और मन्दारके पुष्पोंकी सुरभि लेकर बड़ी ही शीतल और सुगन्धित मन्द-मन्द वायु चल रही थी और उसकी महँकसे मतवाले होकर भौंरे इधर-उधर मँडरा रहे थे॥ ११॥✎ 1432

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1432 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकसे → महँकसे

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