श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

गोप्य ऊचुः

भजतोऽनुभजन्त्येक एक एतद्विपर्ययम्।

नोभयांश्‍च भजन्त्येक एतन्‍नो ब्रूहि साधु भोः॥ १६

bhajato'nubhajantyeka eka etadviparyayam|

nobhayāṃśca bhajantyeka etanno brūhi sādhu bhoḥ|| 16

अर्थ

गोपियोंने कहा—नटनागर! कुछ लोग तो ऐसे होते हैं, जो प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं और कुछ लोग प्रेम न करनेवालोंसे भी प्रेम करते हैं। परंतु कोई-कोई दोनोंसे ही प्रेम नहीं करते। प्यारे! इन तीनोंमें तुम्हें कौन-सा अच्छा लगता है?॥ १६॥

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