श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

एका भ्रुकुटिमाबध्य प्रेमसंरम्भविह्वला।

घ्नतीवैक्षत् कटाक्षेपैः संदष्टदशनच्छदा॥ ६

ekā bhrukuṭimābadhya premasaṃrambhavihvalā|

ghnatīvaikṣat kaṭākṣepaiḥ saṃdaṣṭadaśanacchadā|| 6

अर्थ

पाँचवीं गोपी प्रणयकोपसे विह्वल होकर, भौंहें चढ़ाकर, दाँतोंसे होठ दबाकर अपने कटाक्ष-बाणोंसे बींधती हुई उनकी ओर ताकने लगी॥ ६॥

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