श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

कर्णोत्पलालकविटंककपोलघर्म-

वक्त्रश्रियो वलयनूपुरघोषवाद्यैः।

गोप्यः समं भगवता ननृतुः स्वकेश-

स्रस्तस्रजो भ्रमरगायकरासगोष्ठ्याम्॥ १६

karṇotpalālakaviṭaṃkakapolagharma-

vaktraśriyo valayanūpuraghoṣavādyaiḥ|

gopyaḥ samaṃ bhagavatā nanṛtuḥ svakeśa-

srastasrajo bhramaragāyakarāsagoṣṭhyām|| 16

अर्थ

उनके कानोंमें कमलके कुण्डल शोभायमान थे। घुँघराली अलकें कपोलोंपर लटक रही थीं। पसीनेकी बूँदें झलकनेसे उनके मुखकी छटा निराली ही हो गयी थी। वे रासमण्डलमें भगवान् श्रीकृष्णके साथ नृत्य कर रही थीं। उनके कंगन और पायजेबोंके बाजे बज रहे थे। भौंरे उनके ताल-सुरमें अपना सुर मिलाकर गा रहे थे। और उनके जूड़ों तथा चोटियोंमें गुँथे हुए फूल गिरते जा रहे थे॥ १६॥✎ 1669

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1669 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: झिल-मिला → झिलमिला

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