परीक्षित्! भगवान्के अंगोंका संस्पर्श प्राप्त करके गोपियोंकी इन्द्रियाँ प्रेम और आनन्दसे विह्वल हो गयीं। उनके केश बिखर गये। फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त-व्यस्त हो गये। वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकीको भी पूर्णतया सँभालनेमें असमर्थ हो गयीं॥ १८॥✎ 1669
तदङ्गसङ्गप्रमुदाकुलेन्द्रियाः
केशान् दुकूलं कुचपट्टिकां वा।
नाञ्जः प्रतिव्योढुमलं व्रजस्त्रियो
विस्रस्तमालाभरणाः कुरूद्वह॥ १८
परीक्षित्! भगवान्के अंगोंका संस्पर्श प्राप्त करके गोपियोंकी इन्द्रियाँ प्रेम और आनन्दसे विह्वल हो गयीं। उनके केश बिखर गये। फूलोंके हार टूट गये और गहने अस्त-व्यस्त हो गये। वे अपने केश, वस्त्र और कंचुकीको भी पूर्णतया सँभालनेमें असमर्थ हो गयीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 334) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)