परीक्षित्! यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं—उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है—फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल-खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया॥ २०॥✎ 1669
कृत्वा तावन्तमात्मानं यावतीर्गोपयोषितः।
रेमे स भगवांस्ताभिरात्मारामोऽपि लीलया॥ २०
परीक्षित्! यद्यपि भगवान् आत्माराम हैं—उन्हें अपने अतिरिक्त और किसीकी भी आवश्यकता नहीं है—फिर भी उन्होंने जितनी गोपियाँ थीं, उतने ही रूप धारण किये और खेल-खेलमें उनके साथ इस प्रकार विहार किया॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.33.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 334) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/33/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)