॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.33.22
गोप्यः स्फुरत्पुरटकुण्डलकुन्तलत्विड्-
गण्डश्रिया सुधितहासनिरीक्षणेन।
मानं दधत्य ऋषभस्य जगुः कृतानि
पुण्यानि तत्कररुहस्पर्शप्रमोदाः॥ २२
gopyaḥ sphuratpuraṭakuṇḍalakuntalatviḍ-
gaṇḍaśriyā sudhitahāsanirīkṣaṇena|
mānaṃ dadhatya ṛṣabhasya jaguḥ kṛtāni
puṇyāni tatkararuhasparśapramodāḥ|| 22
अर्थ
परीक्षित्! भगवान्के करकमल और नखस्पर्शसे गोपियोंको बड़ा आनन्द हुआ। उन्होंने अपने उन कपोलोंके सौन्दर्यसे, जिनपर सोनेके कुण्डल झिलमिला रहे थे और घुँघराली अलकें लटक रही थीं, तथा उस प्रेमभरी चितवनसे, जो सुधासे भी मीठी मुसकानसे उज्ज्वल हो रही थी, भगवान् श्रीकृष्णका सम्मान किया और प्रभुकी परम पवित्र लीलाओंका गान करने लगीं॥ २२॥✎ 1669