श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

आप्तकामो यदुपतिः कृतवान् वै जुगुप्सितम्।

किमभिप्राय एतं नः संशयं छिन्धि सुव्रत॥ २९

āptakāmo yadupatiḥ kṛtavān vai jugupsitam|

kimabhiprāya etaṃ naḥ saṃśayaṃ chindhi suvrata|| 29

अर्थ

मैं मानता हूँ कि भगवान् श्रीकृष्ण पूर्णकाम थे, उन्हें किसी भी वस्तुकी कामना नहीं थी, फिर भी उन्होंने किस अभिप्रायसे यह निन्दनीय कर्म किया? परम ब्रह्मचारी मुनीश्‍वर! आप कृपा करके मेरा यह सन्देह मिटाइये॥ २९॥

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