श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

अनुग्रहाय भूतानां मानुषं देहमास्थितः।

भजते तादृशीः क्रीडा याः श्रुत्वा तत्परो भवेत्॥ ३७

anugrahāya bhūtānāṃ mānuṣaṃ dehamāsthitaḥ|

bhajate tādṛśīḥ krīḍā yāḥ śrutvā tatparo bhavet|| 37

अर्थ

भगवान् जीवोंपर कृपा करनेके लिये ही अपनेको मनुष्यरूपमें प्रकट करते हैं और ऐसी लीलाएँ करते हैं, जिन्हें सुनकर जीव भगवत्परायण हो जायँ॥ ३७॥

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