॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.33.39
ब्रह्मरात्र उपावृत्ते वासुदेवानुमोदिताः।
अनिच्छन्त्यो ययुर्गोप्यः स्वगृहान् भगवत्प्रियाः॥ ३९
brahmarātra upāvṛtte vāsudevānumoditāḥ|
anicchantyo yayurgopyaḥ svagṛhān bhagavatpriyāḥ|| 39
अर्थ
ब्रह्माकी रात्रिके बराबर वह रात्रि बीत गयी। ब्राह्ममुहूर्त आया। यद्यपि गोपियोंकी इच्छा अपने घर लौटनेकी नहीं थी, फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे वे अपने-अपने घर चली गयीं। क्योंकि वे अपनी प्रत्येक चेष्टासे, प्रत्येक संकल्पसे केवल भगवान्को ही प्रसन्न करना चाहती थीं॥ ३९॥