श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्पवृष्टयः।

जगुर्गन्धर्वपतयः सस्त्रीकास्तद्यशोऽमलम्॥ ५

tato dundubhayo nedurnipetuḥ puṣpavṛṣṭayaḥ|

jagurgandharvapatayaḥ sastrīkāstadyaśo'malam|| 5

अर्थ

स्वर्गकी दिव्य दुन्दुभियाँ अपने-आप बज उठीं। स्वर्गीय पुष्पोंकी वर्षा होने लगी। गन्धर्वगण अपनी-अपनी पत्‍नियोंके साथ भगवान्‌के निर्मल यशका गान करने लगे॥ ५॥✎ 2090

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2090 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें