॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.34.3
गावो हिरण्यं वासांसि मधु मध्वन्नमादृताः।
ब्राह्मणेभ्यो ददुः सर्वे देवो नः प्रीयतामिति॥ ३
gāvo hiraṇyaṃ vāsāṃsi madhu madhvannamādṛtāḥ|
brāhmaṇebhyo daduḥ sarve devo naḥ prīyatāmiti|| 3
अर्थ
वहाँ उन्होंने आदरपूर्वक गौएँ, सोना, वस्त्र, मधु और मधुर अन्न ब्राह्मणोंको दिये तथा उनको खिलाया-पिलाया। वे केवल यही चाहते थे कि इनसे देवाधिदेव भगवान् शंकर हमपर प्रसन्न हों॥ ३॥✎ 2091