॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.35.16
निजपदाब्जदलैर्ध्वजवज्र-
नीरजांकुशविचित्रललामैः ।
व्रजभुवः शमयन् खुरतोदं
वर्ष्मधुर्यगतिरीडितवेणुः ॥ १६
nijapadābjadalairdhvajavajra-
nīrajāṃkuśavicitralalāmaiḥ |
vrajabhuvaḥ śamayan khuratodaṃ
varṣmadhuryagatirīḍitaveṇuḥ || 16
अर्थ
अरी वीर! उनके चरणकमलोंमें ध्वजा, वज्र, कमल, अंकुश आदिके विचित्र और सुन्दर-सुन्दर चिह्न हैं। जब व्रजभूमि गौओंके खुरसे खुद जाती है, तब वे अपने सुकुमार चरणोंसे उसकी पीड़ा मिटाते हुए गजराजके समान मन्दगतिसे आते हैं और बाँसुरी भी बजाते रहते हैं। उनकी वह वंशीध्वनि, उनकी वह चाल और उनकी वह विलासभरी चितवन हमारे हृदयमें प्रेमके, मिलनकी आकांक्षाका आवेग बढ़ा देती है। हम उस समय इतनी मुग्ध, इतनी मोहित हो जाती हैं कि हिल-डोलतक नहीं सकतीं, मानो हम जड़ वृक्ष हों! हमें तो इस बातका भी पता नहीं चलता कि हमारा जूड़ा खुल गया है या बँधा है, हमारे शरीरपरका वस्त्र उतर गया है या है॥ १६-१७॥