श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

कुन्ददामकृतकौतुकवेषो

गोपगोधनवृतो यमुनायाम्।

नन्दसूनुरनघे तव वत्सो

नर्मदः प्रणयिनां विजहार॥ २०✎ 1159

kundadāmakṛtakautukaveṣo

gopagodhanavṛto yamunāyām|

nandasūnuranaghe tava vatso

narmadaḥ praṇayināṃ vijahāra|| 20

अर्थ

नन्दरानी यशोदाजी! वास्तवमें तुम बड़ी पुण्यवती हो। तभी तो तुम्हें ऐसे पुत्र मिले हैं। तुम्हारे वे लाड़ले लाल बड़े प्रेमी हैं, उनका चित्त बड़ा कोमल है। वे प्रेमी सखाओंको तरह-तरहसे हास-परिहासके द्वारा सुख पहुँचाते हैं। कुन्दकलीका हार पहनकर जब वे अपनेको विचित्र वेषमें सजा लेते हैं और ग्वालबाल तथा गौओंके साथ यमुनाजीके तटपर खेलने लगते हैं, उस समय मलयज चन्दनके समान शीतल और सुगन्धित स्पर्शसे मन्द-मन्द अनुकूल बहकर वायु तुम्हारे लालकी सेवा करती है और गन्धर्व आदि उपदेवता वंदीजनोंके समान गा-बजाकर उन्हें सन्तुष्ट करते हैं तथा अनेकों प्रकारकी भेंटें देते हुए सब ओरसे घेरकर उनकी सेवा करते हैं॥ २०-२१॥

यह अर्थ श्लोक 20–21 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1159 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): २ → २०

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