श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

अनुचरैः समनुवर्णितवीर्य

आदिपूरुष इवाचलभूतिः।

वनचरो गिरितटेषु चरन्ती-

र्वेणुनाऽऽह्वयति गाः स यदा हि॥ ८

anucaraiḥ samanuvarṇitavīrya

ādipūruṣa ivācalabhūtiḥ|

vanacaro giritaṭeṣu carantī-

rveṇunā''hvayati gāḥ sa yadā hi|| 8

अर्थ

अरी वीर! जैसे देवता लोग अनन्त और अचिन्त्य ऐश्‍वर्योंके स्वामी भगवान् नारायणकी शक्तियोंका गान करते हैं, वैसे ही ग्वालबाल अनन्तसुन्दर नटनागर श्रीकृष्णकी लीलाओंका गान करते रहते हैं। वे अचिन्त्य ऐश्‍वर्य-सम्पन्‍न श्रीकृष्ण जब वृन्दावनमें विहार करते रहते हैं और बाँसुरी बजाकर गिरिराज गोवर्धनकी तराईमें चरती हुई गौओंको नाम ले-लेकर पुकारते हैं, उस समय वनके वृक्ष और लताएँ फूल और फलोंसे लद जाती हैं, उनके भारसे डालियाँ झुककर धरती छूने लगती हैं, मानो प्रणाम कर रही हों, वे वृक्ष और लताएँ अपने भीतर भगवान् विष्णुकी अभिव्यक्ति सूचित करती हुई-सी प्रेमसे फूल उठती हैं, उनका रोम-रोम खिल जाता है और सब-की-सब मधुधाराएँ उँड़ेलने लगती हैं॥ ८-९॥

यह अर्थ श्लोक 8–9 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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